ओडिशा की राजनीति में हाल ही में एक घटनाक्रम उस समय आया जब मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उन्हें दी गई एक खास चुनौती का जवाब दिया। यह घटनाक्रम बेरहमपुर में एक रैली के दौरान घटित हुआ, जहाँ प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री पटनायक को चुनौती दी थी कि वे ओडिशा के सभी जिलों के नाम और उनकी राजधानियों का नामकरण करें, बिना किसी लिखित सामग्री की सहायता के।
मुख्यमंत्री पटनायक ने इसे न केवल चुनौती के रूप में लिया, बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री के इस कदम को ओडिशा की सांस्कृतिक और प्रशासनिक समझ की अनदेखी करने वाला बताया। पटनायक ने उल्लेख किया कि ओडिया भाषा को भले ही क्लासिकल भाषा का दर्जा प्राप्त हो, प्रधानमंत्री ने इसे अनदेखा किया और उन्होंने क्लासिकल ओडिसी संगीत की मान्यता के लिए दो बार प्रस्ताव दिए, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया।
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि कैसे केंद्र सरकार ओडिशा से कोयला निकालती है, लेकिन कोयले पर रॉयल्टी पिछले दस वर्षों से अपरिवर्तित रही है। उन्होंने मोदी सरकार की इस बात को लेकर भी सवाल उठाए कि कैसे इसने हाल ही में भारत रत्न सम्मानित करते समय ओडिशा के वीर पुत्रों की उपेक्षा की।
इसके विपरीत, प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैली में कहा कि बीजेपी के शासन में ओडिया भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बीजेडी और कांग्रेस ने राज्य की समृद्ध संसाधनों के बावजूद इसे गरीबी में धकेल दिया है। ओडिशा में चार चरणों में चुनाव होने जा रहे हैं, जो 13 मई से 1 जून तक चलेंगे और वोटों की गिनती 4 जून को होगी। प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे उन्हें मौका दें ताकि वे अगले पांच वर्षों में राज्य को नंबर वन बना सकें।
ashish das 12.05.2024
मुख्यमंत्री पटनायक ने जिला‑नामकरण चुनौती पर अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत किया; उन्होंने बताया कि ओडिशा के सांस्कृतिक धरोहर की समझ बिना लिखित सामग्री के करना असंभव है। उनका तर्क यह था कि भाषा एवं इतिहास का सही अभिलेख ही सही निर्णय को जन्म देता है। वे यह भी उल्लेखित करते हैं कि क्लासिकल ओडिया संगीत के दो प्रस्तावों की अस्वीकृति ने इस बात को उजागर किया है कि केंद्रीय नीतियों में क्षेत्रीय विविधताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। अंत में उन्होंने यह संकेत दिया कि ओडिशा के विकास हेतु संतुलित राजनैतिक चर्चा आवश्यक है।
vishal jaiswal 12.05.2024
पटनायक जी ने रैली में उल्लेख किया कि कोयला रॉयल्टी की स्थिरता ने राज्य की वित्तीय स्थिरता को प्रभावित किया है; यह आर्थिक संकेतक नीतिगत असंगतियों को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि ओडिया भाषा को प्राथमिकता देना राष्ट्रीय स्तर पर भाषाई बहुलता को सुदृढ़ करेगा। इस परिप्रेक्ष्य में, केंद्र‑राज्य संवाद में डेटा‑ड्रिवन एप्रोच आवश्यक है।
Amit Bamzai 12.05.2024
ऑडिशा की ज़िला‑नामकरण चुनौती को लेकर पटनायक जी की टिप्पणी में कई आयाम छिपे हैं; ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, भाषाई अधिकार, तथा आर्थिक हितों का ताना‑बाना अत्यंत जटिल है। पहली बात यह कि जिला‑नाम केवल नौकरशाही प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि यह स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक स्मृति का अभिन्न हिस्सा है। जब प्रधानमंत्री ने लिखित सामग्री के बिना कार्य करने को कहा, तो यह अनिवार्य रूप से स्थानीय ज्ञान‑भण्डार के महत्व को घटा‑चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, पटनायक द्वारा उल्लेखित क्लासिकल ओडिया संगीत के दो प्रस्तावों की अस्वीकृति यह संकेत देती है कि सांस्कृतिक पहलुओं को अक्सर नीतियों में टॉप‑लेवल पर विचार नहीं किया जाता। कोयला रॉयल्टी की स्थिरता भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है; यदि रॉयल्टी में वृद्धि न हो तो राज्य की ऊर्जा‑आधारित आय में कमी आती है, जिससे विकासात्मक परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। वहीँ दूसरी ओर, केंद्र सरकार द्वारा ओडिया भाषा को प्रोत्साहन देने का दावा, जबकि वास्तविक कार्यान्वयन में अंतर दिखता है, जिससे प्रश्न उठता है कि क्या यह केवल राजनीतिक शब्दांकन है। पटनायक के अनुसार, ओडिशा की संस्कृति और इतिहास को उचित सम्मान नहीं मिलने से चयनित संसदीय वक्तव्य निरर्थक बन जाता है। इस संदर्भ में, चुनावी समय में सत्ता‑परिवर्तन के रुख को देखते हुए, चर्चा का फोकस केवल वोट‑गिनती पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नीति‑निर्माण पर होना चाहिए। अंत में, यह कहा जा सकता है कि इस बहस में दोनों पक्ष को अपने‑अपने क्षेत्रों की वास्तविक आवश्यकताओं को समझते हुए संतुलित समाधान खोजने की जरूरत है।
ria hari 12.05.2024
पटनायक जी की बातों में एक सकारात्मक दिशा दिखती है; यह हम सबको प्रेरित करना चाहिए कि स्थानीय ज्ञान को मुख्यधारा में लाया जाए।
Alok Kumar 12.05.2024
देखिये, ये सब बढ़िया-चढ़िया शब्द हैं, लेकिन वास्तविक आंकड़े नहीं दिखाते; जब कोयला रॉयल्टी में कोई बदलाव नहीं होता तो विकास का कल्याण कैसे हो सकता है? यह सिर्फ़ राजनीतिक शोबाज़ी नहीं, बल्कि आर्थिक वास्तविकता है।
Nitin Agarwal 12.05.2024
ओडिशा में सांस्कृतिक विविधता को सच्ची मान्यता चाहिए।
Ayan Sarkar 12.05.2024
वास्तव में, यह पहल केवल सतह पर ही चमकती है; पीछे की गुप्त ताकतें यह सुनिश्चित करती हैं कि केंद्र की नीति स्थानीय हितों से ऊपर रहती है। इस कारण से, नामकरण जैसी छोटी‑छोटी पहलें भी अक्सर बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बन जाती हैं।
Amit Samant 12.05.2024
राजनीतिक संवाद में पारदर्शिता और तत्परता आवश्यक है; पटनायक जी का यह कदम ओडिशा के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को सुदृढ़ करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। आगे भी ऐसी पहलें हमें सामुदायिक संवाद में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित कर सकती हैं।
Jubin Kizhakkayil Kumaran 12.05.2024
देशभक्तों को यह समझना चाहिए कि राष्ट्रीय एकता का अर्थ है सबकी आवाज़ सुनना, न कि केवल एक पक्ष की ध्वनि को बढ़ावा देना। इस प्रकार के विवादों में हमें सच्ची अखंडता के साथ आगे बढ़ना चाहिए।