ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी (JPC) क्या है और क्यों जरूरी है
कभी-कभी ऐसा मामला आता है जिसे सिर्फ एक मंत्रालय या संसदीय समिति से न सुलझा पाएँ। तब संसद कई बार दोनों सदनों की संयुक्त कमेटी बनाती है — यही ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी या JPC होती है। यह एक शक्तिशाली जांच मंच है जो बड़े मामलों की तफ्तीश, दस्तावेज मांगने और गवाह बुलाने का अधिकार रखती है।
JPC का काम रिपोर्ट बनाकर संसद के सामने सिफारिशें रखना होता है। ये सिफारिशें जांच की नतीजा बताती हैं—कहाँ कमी थी, किसने क्या जिम्मेदारी निभाई और आगे क्या कदम उठाने चाहिए। कई बार सरकार या मामलों से जुड़ी संस्थाएँ JPC की सिफारिशों पर कार्रवाई करती हैं, और कभी राजनीतिक व सार्वजनिक दबाव से सुधार भी आते हैं।
JPC कैसे बनती है और इसके अधिकार क्या हैं?
JPC बनाने के लिए संसदीय प्रस्ताव (motion) पास करना होता है। दोनों सदनों के सदस्य इसमें शामिल होते हैं और आम तौर पर विपक्ष व सरकार दोनों के प्रतिनिधि रहते हैं। JPC के पास गवाह बुलाने, दस्तावेज मांगने, और सबूत जुटाने का अधिकार है। इसका मतलब है कि बैंक रिकॉर्ड, सरकारी फाइलें या किसी संस्था के दस्तावेज उसे देने पड़ सकते हैं।
हालांकि JPC के पास आरोपी को सज़ा दिलाने की या सीधे मुक़दमा चलाने की शक्ति नहीं होती। उसकी शक्ति सिफारिश देने तक सीमित रहती है। फिर भी उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होने पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई तेज़ हो सकती है।
नागरिक के लिए practical टिप्स — JPC रिपोर्ट कैसे पढ़ें और समझें
अगर कोई JPC बनी है या रिपोर्ट आयी है तो इसे पढ़कर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मुद्दा कितना गंभीर था और सरकार या संस्थाओं ने क्या कहा। रिपोर्ट्स आम तौर पर संसद की वेबसाइट पर PDF में मिल जाती हैं। मीडिया समरी पढ़ना आसान रास्ता है, मगर असली भारवाही बातें रिपोर्ट के निष्कर्ष और अनुशंसाओं में होती हैं।
कुछ सरल कदम अपनाएँ: 1) संसद की अधिकारी साइट या Gazette में रिपोर्ट डाउनलोड करें; 2) निष्कर्ष (conclusions) और अनुशंसाएँ (recommendations) हिस्से पर पहले नज़र डालें; 3) जिन लोगों या संस्थाओं का नाम आया है, उनकी प्रतिक्रिया खोजें; 4) अगर आप एक्टिव नागरिक हैं तो सांसदों को ईमेल या सोशल मीडिया पर टैग करके कार्रवाई की माँग कर सकते हैं।
JPC की सुनवाई सार्वजनिक होती है या नहीं, मामला और सुरक्षा कारणों पर निर्भर करता है। कई बार संवेदनशील दस्तावेज गोपनीय रखे जाते हैं—ऐसे मामलों में मीडिया रिपोर्ट्स और संसद के डिबेट्स पर ध्यान दें।
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